Friday, November 16, 2012

लोकक आँखिक पानि


जोश तखन होयत सफल, सुमन हृदय मे होश।
भेटत किछु मदहोश छथि, जागल मे बेहोश।।

के किनका सँ कम एतय, अप्पन बातक मानि।
सूखि रहल अछि नित सुमन, लोकक आँखिक पानि।।

बूढ़ पुरानक बात के, सुमन आय की मोल?
मुँह टेढ़ सुनितहि करत, जेना खेलथि ओल।।

काज सुमन की ज्ञान के, जे बन्धन के मूल?
अहंकार पढ़िकय बढ़य, बूझि लियऽ छी भूल।।

संस्कार छी पैघ केर, छोट करथि सत्कार।
जिनगी बस व्यवहार छी, सुमन बुझल व्यापार।

अपन किबाड़ी बन्द कय, नीक लोक छथि कात।
शेष लोक नित नित सुमन, अपन मनाबथि बात।।

मैथिल मिथिला मैथिली, जागू सकल समाज।
चिन्ता नहि चिन्तन करू, बचत सुमन के लाज।।

Tuesday, November 13, 2012

निर्दोष जीवक हत्या - एक विचारणीय प्रश्न


गामक जागरूक आ उत्साही लोकक सहयोग सँ काल्हि चैनपुर मे "गामक विकास लेल मैराथनक" सफल आ ऐतिहासिक आयोजन भेल। आय गाम मे "क्विज" प्रतियोगिताक आयोजन अछि। सचमुच एक नूतन दिशा आ प्रशंसनीय प्रयास। बधाई के पात्र छथि आयोजनकर्ता सब।

आय गाम मे काली पूजाक दोसर दिन छी। आय दुनु काली घर मे करीब १५०० निर्दोष छागर आ पारा केर बलि-प्रदान (हत्या) सेहो होयत शाक्त-पूजाक नाम पर। हम आयधरि एहि धार्मिक नृशंसताक औचित्य नहि बुझि सकलहुँ? बहुत किछु पढ़बाक प्रयास केलहुँ, बहुत विद्वान सँ वार्ता सेहो भेल परन्तु हम संतुष्ट नहि छी एखनहुँ। बहुत विचार केलहुँ धार्मिक-आध्यात्मिक दृष्टिकोणे, मानवीय दृष्टिकोणे, वैज्ञानिक आ इकोलाजिकल बैलेन्सक दृष्टिकोणे - मुदा समाधान नहि भेटल जे एहि तथाकथित "धार्मिक हत्याक" आखिर औचित्य की?

हम नास्तिकता के समर्थक नहि छी। पूजा पाठ खूब करय छी आ विश्वास सेहो राखैत छी। हम जनैत छी जे एहि पोस्ट पर कतेक गोटय के विरोध सेहो हेतेन्ह आ सँगहि सँग कतेक तर्क सेहो भेटत एहि कृत्यक समर्थन मे। हम इहो जनैत छी जे मात्र हमरा किछु लिखने वा कहला सँ ई सैकड़ों सालक परम्परा रुकबो नहि करतय। तथापि आय नहि रोकि सकलहुँ अप्पन एहि अवधारणा केँ पोस्ट करय सँ। सँगहिं सँग ईहो निवेदन जे हम्मर उद्येश्य किनको धार्मिक भावना केँ चोट पहुँचेबाक नहि अछि। 

हम गामक समस्त लोक, विद्वान, प्रबुद्ध-वर्ग सँ विनम्र निवेदन करैत छी जे अप्पन अप्पन विचार एहि विषय पर राखथि जे एहि निर्दोष जीवक बलि-प्रदानक (हत्या) आखिर औचित्य की? एहि बहाना हमरो ज्ञान मे किछु वृ्द्धि भऽ सकैत अछि वा एहि कारणे जन-जागरण सेहो सम्भव अछि। 

Wednesday, October 31, 2012

जागत सकल समाज


उत्साहित युवजन सुमन, ताकि रहल आयाम।
भाव सभक मोनक बनल, विकसित हम्मर गाम।।

चैनपुर छी गाम हमर, जिला सहरसा बीच।
नेता, मंत्री जे सुमन, काज हुनक छल नीच।।

देर, मुदा जागल युवा, भरल मोन मे जोश।
बात खुशी के ई सुमन, बाँचल सभहक होश।।

शुरू करब नहि अछि कठिन, जारी राखब काज।
निश्चित फल भेटत सुमन, जागत सकल समाज।।

आँकब नहि कम बूढ़ केँ, भेटत सब सहयोग।
औषधि छी अनुभव जखन, सुमन भगाबथि रोग।।

Wednesday, October 24, 2012

नीलकंठ बनू


विजया दशमीक दिन। गामक मूर्ति-विसर्जनक पश्चात, गामक लोक सब गजानन बाबूक दरवाजा पर जमा भेलाह। बुझियो जे आन दिनका जेकाँ एक तरह सँ चौपाले लागि गेल। एक ग्रामीणक प्रश्न छल जे आय सम्पूर्ण देश मे विजया दशमीक पर्व अनेकानेक तरीका सँ मनाओल जाऽ रहल अछि। परन्तु अपना सभहक गाम घर मे नीलकंठ पक्षी केँ प्रयास पूर्वक ताकल जाइत अछि पुनि ओकरा उड़ाओल सेहो जाइत अछि कियैक? 

गजानन बाबू बजलाह - देखियो नीलकंठ सँ हमरा सभहक जीवनक बहुत किछु जुड़ल अछि। हमर सभहक पूर्वज बहुत दूरदर्शी छलाह आ प्रतीकात्मक ढंग सँ अपना रिवाज मे बहुतो चीज एहेन जोड़ने रहथि जकर सरोकार आम-जिनगी सँ होइत छल। गाम घर मे आजुक दिन लोक सब नीलकंठ पक्षी केँ देखि अप्पन अप्पन जतरा (यात्रा शब्दक देशज रूप) बनाबय छथि आ नीलकंठक उड़य केर दिशा सँ भरि सालक जतरा केहेन रहत? एकर अनुमान करबाक लौकिक परम्परा सेहो अछि। 

नीलकंठ एक बहुत उपयोगी पक्षी होइत अछि। खेत मे लागल फसल कें नुकसान पहुँचाबयबला जत्तेक कीड़ा, मकोड़ा एत्तेक तक की साँपो, नीलकंठक आहार थीक। आय-काल्हि जे खेत मे कीटनाशकक नाम पर जहर छीटल जाऽ रहल अछि ओकर कोनो जरूरते नहि छैक जौं नीलकंठ पक्षी टा बाँचल रहय। मुदा सुनबा आ देखबा मे आबि रहल अछि जे गिद्ध जेकाँ आय-काल्हि नीलकंठो अलोपित भऽ रहल अछि। देखारे नहि पड़ैत अछि। ई सबटा बेसी फसल आ बेसी दूधक कारणे जे सगरे जहर छीटल जाऽ रहल अछि, ओकरे परिणाम छी। जहिना गिद्ध एक उपयोगी पक्षी अछि, जकरा एक प्राकृतिक "सफाई-कर्मचारी" सेहो कहल जाइत अछि, तहिना नीलकंठ पक्षी सेहो फसल सहित मानवताक लेल बहुत उपयोगी अछि। गिद्धक ऊपर तऽ सरकारक ध्यान गेल आ आब ओकर सरकारी संरक्षण आ अभिवर्धनक उपाय भऽ रहल अछि। मुदा नीलकंठक बारे कोनो चर्चा कतहु नहि अछि? 

प्रायः सब गाम मे अपने सब देखने हेबय जे गामक प्रवेशे-द्वार पर नीलकंठक मंदिर होइत अछि। मानू जे साक्षात नीलकंठ ओहि गामक रखबारी कऽ रहल छथि। ओहिनहियो हमरा "नीलकंठ" शब्द सँ बहुत प्रेम अछि। हमरा, अहाँ केँ वा किनको दिन मे कतेक बेर नीलकंठ बनऽ पड़ैत अछि? कहियो सोचने छिये?

गजानन बाबूक बजबाक क्रम जारी छल - समुन्द्र मंथनक पश्चात् जखन कालकूट जहर निकलल तखन देवगण चिन्तित भेलाह जे आब एहि जहरक कोन उपाय हेतय? बाहर फेंकने सँ संसारक  नाश भेनाय निश्चित छैक। विस्तार मे नहि जाय छी कियैक तऽ ई खिस्सा सब गोटय जनिते होयब। भगवान शंकर तैयार भेलाह आ अपना कंठ मे ओहि कालकूट जहर केँ योगबल सँ स्थान देलखिन्ह जाहि कारणे हुनक कंठ नीला भऽ गेल आ हुनक नाम ताहि दिन सँ नीलकंठ भऽ गेल। जहरक ताप कम करबाक लेल हुनका जटा मे गंगा, माथा पर चन्द्रमा आ गरदैन मे साँप (सब शीतलताक प्रतीक) आबि गेल।

गजानन बाबू पुनि बजलाह -आब अपना अपना जिनगी मे सब सब कियो ईमानदारी सँ सोचय जाऊ जे परिवार होय वा समाज, आफिस होय वा बाजार - हमरा सब केँ कत्तेक बेर ओहेन काज विवशता मे करऽ पड़ैत अछि जे हम सचमुच हृदय सँ नहि करऽ चाहैत छी। मात्र परिवारक, समाजक, नौकरीक, व्यापारक रक्षा लेल। दोसर शब्द मे कही तऽ जहर पीबऽ पड़ैत अछि। कहू फुसियो कहय छी? आब सब कियो अपना मोने मोन सोचियो जे हमहुँ सब रोजे नीलकंठ बनय छी कि नहि? जाबत नीलकंठ नहि बाँचत आ जाबत हमसब नीलकंठ नहि बनब ताबत जिनगीक जतरा कोना बनत यौ? ताहि हेतु नीलकंठ बनय जाऊ। कोनो पारम्परिक बात केँ जीवन सँ जोड़ि देनाय ई गजानन बाबूक विद्वता आ तर्क-शक्तिक कमाल थीक जाहि सँ सब ग्रमीण प्रायः परिचिते छथि।

Saturday, October 13, 2012

हम पान आ प्राण संगहिं छोड़ब।

दिन राति जतऽ देखू ततऽ जाने अनजाने प्रायः सब कियो अप्पन अप्पन विशिष्टता (अहंकार सेहो कहि सकय छी) स्थपित करय मे लागल रहय छथि। बस अवसर भेटबाक चाही। एक महिला मित्र (या मित्राणी जे कही) सँ बातचीत होइत छल। अप्पन विशिष्टताक बोध करबैत बजलीह - हम एहि कारणे अमुक संस्था छोड़ि देलहुँ, अमुक कारणे अमुक संगठन। हमरा कनियो टा अनर्गल बात बर्दाश्त नहि होइत अछि आदि आदि ---। कने देरक बाद पुनः शुरू भेलीह हम चाय छोड़ि देलहुँ, हमरा आब भोजनो सँ ओतेक अनुराग नहि। यानि जेहेन प्रसंग आ परिवेश तेहने अप्पन विशिष्टता पर हुनक वक्तव्य। हमहुँ कतेक सुनितहुँ? एकाएक मुँह सँ निकलल - मित्र अहाँ बिल्कुल ठीक कऽ रहल छी। भने धीरे धीरे सब किछु छोड़य केर आदत बना रहल छी। एक दिन तऽ ई देह आ दुनिया सेहो छूड़ैये पड़त ने। नीक अछि छोड़बाक पूर्वाभ्यास भऽ रहल अछि। हमर महिला मित्र लजाऽ गेलीह।

जीवन जीयब एक धर्म छी। आ धर्म की? विद्वान लोकक मुँह सँ सुनने छी जे "यः धारयति स धर्मः"। अर्थात् धर्म धारण करबाक नाम थीक, नहि की छोड़य वा पलायन केर। जिनगी सँ हम सब कियो रोजे रोज टकराबय छी तखन "जीवन-धर्मक" पालन सम्भव भऽ रहल अछि आ हम सब अपना अपना ढंगे जीबि रहल छी। बहुतो बेर इहो सुनने छी चौरासी लाख योनि भ्रमणक पश्चात मानव जीवन भेटैत अछि। आब अहीं सब कहय जाऊ जे एतेक कठिन सँ मानव-जीवन भेटल तखनहुँ यदि जीवन-धर्मक पालन नहि केलहुँ तऽ की केलहुँ?

प्रायः हम सब कम सँ कम एक पत्नी सहित धिया-पुता, भाय-बहिन, माता-पिताक सँगे एक्के घर मे रहय छी। कम या बेसी आपस मे खटपट होइते रहय छैक। तऽ की हम अप्पन परिजन केँ छोड़ि दैत छी? बहुमतक जवाब भेटत नहि। मुदा जे छोड़ि दैत छथि हुनका समाज मे नीक स्थान कहियो भेटय छै की? बिल्कुल नहि। भबिष्यो मे एहने स्थिति शाश्वत काल तक रहत, ई हम सब उम्मीद कऽ सकैत छी। कारण समाज शास्त्रक हिसाबें मनुक्ख केँ एक सामाजिक जानवर कहल गेल अछि। अप्पन गज़लक ई पाँति याद आबि गेल -

भेट जाय भगवान किंचित्, की भेटत इन्सान यौ
मुँह सँ जे लोक अप्पन, मोन सँ बेईमान यौ

ईमानदारीपूर्वक कहऽ चाहैत छी जे खूब विचार केलाक बाद हम अपना बारे मे कहि सकैत छी जे आयधरि हमहुँ "इन्सान" नहि भऽ सकलहुँ। बस पैघ लोकक बनाओल रस्ता पर चलबाक प्रयास भरि कऽ रहल छी। मोन मे अछि यथासम्भव "जीवन-धर्मक" निर्वाह करी। ताहि हेतु कोनो चीज छोड़य सँ बेसी धारण करवाक प्रवृत्ति अछि।

हम खूब मोन सँ पान खाय छी। जीवनक शुरुआती दिन कहियो पानक डाली मे सुपारी नहि तऽ कहियो पानक पात मुरझायल। दिक्कत होमय लागल तऽ प्रयास कऽ सुमन जी (पत्नी) केँ पान खेनाय सिखेलहुँ। आब हमरा सँ बेसी हुनके बेगरता रहैत छन्हि। हमर दिक्कत खतम। किछु दिन पूर्व एहि "पान-प्रेमक" प्रभाव सँ दाँतक डाक्टर लग जाऽ पड़ल। डाक्टर साहेब सलाह देलथि जे अहाँ पान छोड़ि दियऽ। हमरा मुँह पर मुस्कान देखि डाक्टर साहेब पुनि बाजि उठलाह हँसलहुँ कियैक? हम बजलहुँ - डाक्टरक सलाह तऽ मानब हमर मजबूरी अछि ने? नहि तऽ ----। डाक्टर साहेब बजलाह - नहि तऽ की विचार अछि? हम बजलहुँ - यदि हम्मर विचारक बात होय तऽ हम पान आ प्राण एक्के सँग छोड़ब। डाक्टर साहेब हँसय लगलाह।

Wednesday, October 10, 2012

अप्पन अप्पन - देखू दर्पण

गजानन बाबूक दरवाजा पर साँझक समय आय पुनः चौपाल सजल छल। गामक लोक सब अपना अपना काज सँ निवृत भऽ सब दिनक भाँति चौपाल मे आबि बैसल रहथि। आय गजानन बाबू समाज मे व्याप्त भ्रष्टाचार आ अन्य बुराई पर चिन्तित रहथि। भ्रष्टाचार सँ सम्पूर्ण देश मे हहाकार मचल अछि। अखबार, रेडियो, टेलीवीजन जतऽ देखू ततऽ भ्रष्टाचार सम्बन्धी खिस्सा? की भऽ रहल छैक समाज आ देश मे। जिनका देखू वो भ्रष्टाचार पर व्याख्यान दऽ रहल छथि सँगहि ओकर निदानक उपाय सेहो सुझा रहल छथि अपना अपना हिसाबें। किनको ज्ञान किनको सँ कम रहन्हि तखन ने? पंचायत सँ दिल्ली धरि जिनका अवसर छन्हि, लूटय मे लागल छथि। पहिने सामाजिक व्यवस्थाक कारणे लोक केँ चोरि, छिनरपन सँ लाज आ डर लागैत छलय। परन्तु आब? आब तऽ ई हमर समाजक व्यवस्थाक एक अभिन्न अंग बनि गेल अछि सँगहिं टाका सँ प्रतिष्ठा सेहो भेटैत अछि।

गजानन बाबू ग्रामवासी केँ सम्बोधित करैत बजलाह - अपने सब कनेटा ई बताऊ जे पुलिस हो वा नेता, कलर्क हो वा कलक्टर ई सब तऽ हमरा समाजेक लोक होइत छथि कि नहि? आय जे किछु गड़बड़ भ्रऽ रहल अछि देश वा समाज मे ताहि मे हिनके भूमिका प्रत्यक्षतः देखवा मे आबि रहल अछि। एना कियैक भेल? आ कोना भेल? विचारणीय अछि। हमरा याद आबैत अछि बहुत पुरनका बात। अपने गाम मे एक छलाह सुक्कन बाबू जिनक प्रयास सँ आय अपना गाम मे हाइ स्कूल, डिस्पेन्सरी, खादी-ग्रामोद्योग केन्द्र आदि चलि रहल अछि। गामक लोकक उपकार भऽ रहल छैक। मुदा सुक्कन बाबू केँ अपना जीबैत कहियो लोक मोजरे नहि देलखिन्ह। जानय छी कियैक? कियैक तऽ सुक्कन बाबू अपना जिनगीक शुरूआती दिन मे ताहि दिनक सामाजिक व्यवस्थाक विपरीत वर्जित काज केने रहथि टाका कमाबय खातिर। सुनबा मे तऽ इहो आबैत अछि जे वो बगरो केँ जाल मे फँसा कऽ फलक कहिकय बेचैत रहथि। खैर--- हमर अभिप्राय ई कखनो नहि जे एक दिवंगत आत्माक निन्दा करी। ओहिनहियो हुनका सनक "युग-पुरुष" आब कतय? हमर अभिप्राय छल जे पहिलुका दिन मे अहाँ टाका सँ कतबो मजबूत भऽ जाऊ मुदा सामाजिक वर्जनाक अतिक्रमण केला पर अहाँ केँ समाज मे जिनगी भरि मान्यता नहि भेटत। ई डर सामाजिक व्यवस्था केँ ईमानदार बनेने छल। मुदा आब ई डर सभहक मोन सँ निपत्ता भऽ गेल अछि जे कारण अछि समाज मे आजुक सर्वत्र व्याप्त भ्रष्टाचारक।

किछु देर चिन्तनक पश्चात गजानन बाबू अप्पन एक संस्मरण केँ याद करैत बजलाह - पिताजीक मृत्युक पश्चात हमरा मैट्रिकक परीक्षाक बादे मात्र सवा सोलह सालक उमरि मे गाम सँ रोजगारक लेल बाहर जाऽ पड़ल। पहिल बेर गाम सँ बाहर जेबाक कारणे आ गरीबीक डर सँ हम खूब कनैत छलहुँ। गामक बाहर होइते सीताराम कक्का भेटलाह। हुनका प्रणाम केलहुँ तऽ वो आशीर्वादक पश्चात कहलन्हि जे बेटा अहाँ कनय छी कियैक? खूब हूब सँ जाऊ। नौकरी भेटबे करत। बस एकटा बातक ध्यान राखब जे "जीभ" आ "आचरण" पर सब दिन नियंत्रण राखब। अहाँ सब दिन सुख करब। गजानन बाबू बातक क्रम केँ आगाँ बढ़ाबैत बजलाह - हमरा सचमुच जिनगी मे कतेक बेर एहेन प्रलोभन सेहो भेटल। लेकिन सब बेर हमरा एहेन बुझना गेल जे सीताराम कक्का अप्पन पुरनका बात हमरा सोझाँ मे दोहरा रहल छथि आ हमर डेग सीमा रेखा सँ आगाँ नहि बढ़ि सकल।

गजानन बाबू पुनि बजलाह - नौकरीक करीब पंद्रह बरस बादक एक घटना याद आबैत अछि। एक बुजुर्ग व्यक्ति हमरा सँ पुछलन्हि - की हौ गजानन नौकरी करय छऽ? हमर जवाब - जी हाँ। हुनक प्रतिप्रश्न - "ऊपरी कमाय" कत्तेक होय छऽ? हम्मर जवाब - किछुओ नहि। पुनः हुनक निर्मम प्रतिक्रिया - तखन की खाक नौकरी करय छ? ई जवाब सुनितहिं हम अबाक भऽ गेलहुँ। गजानन बाबू बजलाह - देखू एक्के गाम, लोको ओहने मुदा विचारक स्तर पर कतेक परिवर्तन भऽ गेल? कहबाक तात्पर्य जे कोनो बुराई वा भ्रष्टाचारक प्रशिक्षण तऽ किनको सामाजे मे भेटय छै कि नहि? भ्रष्टाचार मे लिप्त तथाकथित लोक केँ गरियेने सँ किछुओ फायदा नहि? वरन् हमरा सब केँ अप्पन अप्पन भीतर मे देखऽ पड़तय ईमानदारी सँ जे हम कतेक ईमानदार छी आ हम अपना अगिला पीढ़ी केँ की प्रशिक्षित कऽ रहल छी। रोज एक बेर अप्पन अप्पन अन्तर्मनक दर्पण देखबाक जरूरत अछि सब गोटय केँ। नहि तऽ ई सामूहिक सामाजिक सांस्कृतिक अवनयनक युग सँ बाँचब मुश्किल। 

Wednesday, September 19, 2012

बन्द : आम लोकक हित वा अहित?

मँहगाई रोज बढ़ले जाऽ रहल अछि। कहियो डीजल कहियो रसोई गैस तऽ कहियो पेट्रोल। कोन दिन कोन चीजक दाम सरकार बढ़ाऽ देत कहब कठिन? लोक तबाह भऽ गेल अछि जोड़ैत जोड़ैत। हमरा तऽ कखनो काल लागैत अछि जे आदमी छोड़ि सब किछु मँहगे भऽ रहल अछि। आय गामक चौपाल पर गजानन बाबू आबितहिं निराशा-भाव सँ बाजब शुरू केलन्हि। अखबार, रडियो आ कहियो कहियो टी० वी० (बिजलीक अभाव मे देखवाक संयोग कम्मे) सँ अर्जित नित्य-ज्ञानक वमन चौपाल पर गामक लोकक सोझाँ मे केनाय हुनक नियमित कर्म छन्हि। लोको सब हुनका आदत सँ परिचित छथि। लेकिन एहनो बात नहि जे गजानन बाबू खाली गप्पे टा दैत छथिन्ह। देश, राज्य आ समाजक प्रति हुनक विचार सँ सोचबाक लेल लोक सेहो विवश भऽ जाइत छथि।

आब लियऽ? भारत बन्दक आयोजन पुनः भेल बहुत ओहेन राजनैतिक दल आ संगठन द्वारा जाहि मे अधिकतर के विश्वसनीयता आमजनक बीच मे लगभग खतमे बुझू। ओहिनहियो साल भरि तऽ बन्दे बन्दक घोषणा होइत रहैत छैक। कखनो मँहगाई बढ़बाक नाम पर तऽ कखनो भ्रषटाचारक नाम पर। कहियो सरकारी तंत्रक विफलताक नाम पर तऽ कहियो नेताक रूप मे परिवर्तित समाजक कुख्यात अपराधीक "शहीद" भेला पर। कतेक बन्द आ कहिया तक? गजानन बाबू चिन्तित स्वर मे अप्पन वक्तव्यक श्रृंखला जारी राखलन्हि। लोकतंत्र मे सरकार आ व्यवस्थाक खिलाफत करबाक लेल हमरा किछु रास्ता आ तरीका गाँधी बाबा द्वारा सिखओल गेल जाहि मे बन्दक आह्वान् सेहो अछि। परन्तु एहि अधिकारक प्रयोग कखन, कहिया आ कोना करी? एकर विगत कतेक दशक सँ निरन्तर अवहेलना भऽ रहल अछि।

गजानन बाबू बजलाह - हम बन्द समर्थक किछु नेता केँ पुछलहुँ जे आखिर ई बन्द कियै? जवाब भेटल जे मँहगाई आ भ्रष्टाचार सँ आम लोक त्रस्त भऽ गेल अछि। आम लोकक हित मे एहि बन्दक आह्वान भेल अछि। प्रश्न स्वाभाविक अछि जे एहेन बन्द मे प्रायः आमे लोक बेसी परेशान सेहो सेहो होइत छथि। हुनक हित की हेतेय कपार? रोज कमाय-खायबलाक रोजी-रोटी छिनेतय। बीमार लोक अस्पताल नजि जाऽ सकतय आ बच्चा सब विद्यालय। पैघ लोक केँ कोनो अन्तर पड़तय की? लेकिन अपना देश मे तऽ बेसी लोक रोज "लूटि आनू कूटि खायबला" छथि। कहू भेल ने मजेदार बात? आम लोकक हित मे बन्दक आयोजन करयबला दल आ संगठन आम लोकक अहिते ने कऽ रहल छैक। हे भगवान। की हेतय एहि देशक? एहि समाजक? आय काल्हि बन्दक मने भेल सद्यः गुण्डागर्दी। बन्दक आह्वान के मतलब "स्वेच्छा" नहि "विवशता" अर्थात् बन्द करय पड़तौ नहि तऽ तोड़-फोड़ शुरू। सभहक अप्पन अप्पन स्वार्थ। सब एक दोसर केँ ठकय मे लागल अछि।
 
स्वतंत्रता आन्दोलनक समय आ बादो मे कतेक बेर बन्दक आह्वान भेल जाहि मे लोक स्वेच्छा सँ सभहक सहयोग भेटल। दल वा संगठनक एहेन विश्वसनीयता छलैक जे बस आह्वानक देरी आ स्वतः-स्फूर्त विरोध शुरू। कियै देखलिये नहि जे अण्णाक आह्वान पर सम्पूर्ण देशक लोक कोना एकत्रित भऽ गेल? हमरो सभ केँ स्वतः-स्फूर्त बन्द आ जबरदस्तीक बन्दक अन्तर बुझऽ पड़तय। गजानन बाबू कहलन्हि जे हमर अभिप्राय ई कखनहुँ नहि जे गलत बातक विरोधे नहि हेबाक चाही? वरन् दल वा संगठन समाजक बीच अपना नियमित क्रिया-कलाप सँ अप्पन विश्वसनीयता बढ़ाबय तखन फेर जबरदस्तीक कोनो जरूरते नहि पड़तय। लेकिन एहि गुण्डागर्दी सँ भरपूर "बन्द" सँ समाज हित सँ बेसी अहिते होयत

Wednesday, September 12, 2012

अंगरेजी पर सवार हिन्दी प्रेम

आय चौपाल मे गजानन बाबूक चेहरा किछु उखड़ल उखड़ल आ किछु गम्भीर सेहो बुझना गेल। कारण बुझबाक प्रयास केलहुँ तऽ किछु देर बाद बजलाह की कहू? जेहने अपना मिथिला मे मातृभाषा मैथिलीक दशा अछि किछु किछु ओहने हाल राज-भाषा (आयधरि संवैधानिक तौर राष्ट्र-भाषा नहि) हिन्दीक देखवा मे आबि रहल अछि। आय १४ सितम्बर यानि हिन्दी दिवस यानि हिन्दी केँ आजुक दिन सँ सरकारी तौर पर "राज-काजक भाषा" मानल गेल। सँगहि सँग तथाकथित हिन्दी-प्रेमीक एक अनवरत लड़ाय सेहो जे एक दिन हिन्दीओ कम सँ कम हिन्दुस्तान मे राष्ट्र-भाषा बनबे करत। बड़ा विचित्र स्थिति अछि। जहिना साल मे एक दिन हम सब मातृ-भाषा दिवस मनाकऽ अप्पन कर्तव्यक इतिश्री कऽ लय छी बस ओहने खेला राष्ट्रीय स्तर पर सेहो हर साल होइत अछि प्रायः देशक सब सरकारी कार्यालय मे।

गजानन बाबू पुनः बजलाह - अपना देश मे आजादीक बाद जतेक घोषित दिवस अछि सभहक एहने दशा अछि। स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस, गाँधी जयन्ती आदि सनक राष्ट्रीय पर्वक दिन की होइत अछि? बस औपचारिकताक निर्वाह। आओर की? कार्यालयीय स्तर पर जिनक "ड्युटी" लागन्हि से जेबे करताह। या फेर जिनका किछु सम्मान वा पुरस्कारक सूचना भेटैत छन्हि सेहो जाइत छथि। शेष किनका की मतलब? ई सब तऽ एक अतिरिक्त छुट्टी आ आनन्दक दिन के अतिरिक्त किछु नहि। देश-प्रेम वा कोनो महापुरुषक प्रति प्रेम? ई बस हम सब भाषणे टा मे सुनि सकैत छी। सेहो ओहेन व्यक्तित्वक मुँह सँ जे जिनगी भरि देशक अहित कऽ अपने टा हित केलन्हि।

बात केँ आगू बढ़बैत गजानन बाबू कहलखिन्ह - आय पुनः हिन्दी-प्रेमक नाटक देखू। यत्र-तत्र कार्यक्रमक आयोजन होयत। संस्थागत रूप सँ अतिथि बजाओल जायत। जतऽ सुनब आ पढ़ब अन्य वक्ताक सँगे मुख्य वक्ताक लिखल भाषण मे हिन्दीक प्रति अगाध प्रेमक उद्गार भेटत। हाँ ई अलग बात अछि जे ओहि भाषण मे कतेको अवाँछनीय अंगरेजी शब्द सेहो भेट जाय तऽ आश्चर्यक कुनु बात नहि। सबसँ मजेदार बात ई जे जतेक लोक एहि हिन्दी दिवसक कार्यक्रम मे बढ़ि चढ़िकय भाग लय छथि आ हिन्दीक प्रति अपन अनुराग देखबय छथि हुनकर सभहक सबटा धिया-पुता अंगरेजी विद्यालय मे अनिवार्यरूपेण पढ़य छथि। राष्ट्री स्तर पर हर स्थापित दिवसक प्रति एहि नकली प्रेम-प्रदर्शन सँ गजानन बाबू आय किछु दुखी रहथि आ अन्त मे अपना स्कूलक हिन्दी दिवसक कार्यक्रम मे जिला शिक्षा अधीक्षक केर भाषणक मजेदार संस्मरण सुनौलन्हि। जिला शिक्षा अधीक्षकक हिन्दी दिवस पर बयान छलन्हि जे "आजकल लोगों की बहुत बैड हैबिट हो गई है कि हिन्दी बोलने में भी इन्गलिश वर्ड का यूज करते हैं।" अर्थात् अंगरेजी पर सवार हिन्दी-प्रेम।  

Wednesday, September 5, 2012

विद्यार्थी = जे विद्याक अरथी उठाबय

सब साल जेकाँ एहियो साल शिक्षक दिवस बीत गेल। एकटा आओर अघोषित छुट्टीक दिन शिक्षकगण हेतु। महान शिक्षा-शास्त्री डा० सर्वपल्ली राधाकृष्णन जीक जन्म दिवस आ जिनक जीवन यात्रा एक शिक्षकक के रूप मे शुरू भेल आ देशक सर्वोच्च पद राष्ट्रपति तक पहुँचल। हुनके सम्मान मे ई शिक्षक दिवस प्रतीकात्मक रूप मे मनाओल जाइत अछि। आजादीक संघर्ष सँ निकलल ताहि दिनक शासक-वर्गक स्पष्ट धारणा रहन्हि जे एहेन महापुरुषक जीवन-वृत्त केँ स्मरण केला सँ छात्र समेत आओर लोक केँ प्रेरणा भेटतय। मुदा आजुक स्थिति देखि की हम कहि सकय छी जे की वो पवित्र उद्येश्य पूर्ण भऽ रहल अछि?

गजानन बाबू अपना समय केर एक अभूतपूर्व शिक्षक जे एखन भूतपूर्व भऽ गेल छथि। साँझक समय गामक चौपाल मे एनाय आ हुनका सँ गप्प केनाय सँगहिं गजानन बाबू द्वारा प्रयोजित चाय आ तमाकू खेनाय  गामक लोकक प्रायः नियमित दिनचर्या। गजानन बाबू आन दिनक अपेक्षा आय किछु उदास रहथि। लोक पूछय लागलखिन्ह तऽ बजलाह - की कहू? आजुक शिक्षा व्यवस्था मे भेल पतन सँ मोन कने खिन्न अछि। पहिलुका समय मे शिक्षक खाली किताबेटाक ज्ञान-दान नहि करैत रहथिन्ह बल्कि नैतिक, सामाजिक शिक्षा सँ हुनक सरोकार सेहो रहन्हि। शिक्षक - छात्रक बीच एक अद्भुत आत्मीयताक सम्बन्ध सेहो रहय पिता - पुत्रवत्। छात्र अथवा छात्रक अभिभावक द्वारा विद्यालय आ विद्यालय सँ बाहर सेहो शिक्षकक ओतबे मान-सम्मान सामान्य बात छल। कतेक बेर एहनो देखने छी जे यदि धिया-पुता घर मे बेसी उचृंखल बनय तऽ अभिभावक ई कहि शासन करैत रहथिन्ह जे "चलऽ काल्हि मास्टर साहेब सँ तोहर शिकायत करबौ" आ बच्चा शांत। गामक कुनु भोज-भात मे विद्यालय के सब शिक्षक स्थायी रूपें आमंत्रित रहथि सँगहिं यदि शिक्षक गाम तरफ आबथि तऽ धिया-पुता सँ अभिभावक तक अपन जगह ठाढ़ भऽ हुनका सम्मान दैत रहथिन्ह।

मुदा एखन? गजानन बाबू अपना बात केँ आगाँ बढ़बैत बजलाह - सरकारी आदेश - जे विद्यार्थी केँ मरनाय पीटनाय कानूनी अपराध मानल जायत। यानि डर खतम। सरकारी उपेक्षाक कारणे मासक मास शिक्षकक वेतन बन्द। तेसर बात शिक्षकगणक मुख्य सरकारी कार्य - मनुखक जनगणना, पशुक जनगणना, मकानक गणना, चुनाव करेनाय, स्कूल मे खाना बनबेनाय आदि आदि रहि गेल अछि यानि पढ़ाय छोड़िकय आओर सबकिछु। नीति-श्लोक आ नैतिक शिक्षा पाठ्यक्रम बाहर भऽ गेल आ "सेक्स" पढ़ाबय के बात सरकारी स्तर पर होमय लागल। हे भगवान्! परिणाम?  आय-काल्हि हाले एकदम विचित्र भऽ गेल अछि। एके पानक दोकान पर एक्के समय मे मास्टर साहेब आ विद्यार्थी पान - सिगरेटक सेवन करय छथि। कतेक बेर तऽ इहो सुनय मे आबय अछि जे संगे संग मद्य सेवन सेहो करय छथि। गुरू - शिष्य परम्पराक अन्ते भऽ गेल। परिणाम स्वरूप आब विद्यार्थिये शिक्षक केँ धमकाबय लागल। कनिये टा मत-मतान्तर भेला सँ शिक्षकक विरोध मे स्कूलक गेट बन्द आ नाराबाजी शुरू।

चौपाल मे सब मंत्र-मुग्ध भऽ सुनैत रहथि।  गजानन बाबू पुनः बाजब शुरु केलन्हि - विद्यालय शब्दक अर्थ होइत अछि - विद्या + आलय यानि विद्याक घर आ विद्यार्थी शब्दक अर्थ विद्या + अर्थी यानि विद्याक उपार्जन करनिहार। मुदा आजुक समय मे अर्थ बदलि गेल। आय काल्हि विद्यालय = विद्या + लय यानि जाहिठाम विद्या पूर्णरूपेण लय भऽ जाय अर्थात् मट्टी मे मिल जाय आ विद्यार्थी = विद्या + अरथी अर्थात् जे विद्याक अरथी उठाबय। ठीके आजुक समय मे विद्याक अरथीये ऊठि रहल अछि। गजानन बाबूक विवेचना सँ सब अचंभित भऽ सोचय लऽ मजबूर भऽ गेलाह।

Wednesday, August 29, 2012

अभोगिया कर्ण

गामक बाते अद्भुत होइत अछि। एका पर एक लोक आ प्रतिभा। एहने प्रतिभावान व्यक्तित्व मे सँ एक छथि धनेश्वर जी। यथा नाम तथा गुण। खूब टाका पैसावला करोड़पति लोक। एहि धनक अर्जन मे हुनक कृपणताक अर्थात् कंजूसीक बहुत योगदान। आयधरि ज्ञात अज्ञात कंजूसीक जतेक धारा वा विधा देखबा मे आयल अछि हमरा बुझने सभक गंगोत्री धनेश्वर जीक माथा सँ निकलल हेतय आ भबिष्यो मे हमरा उम्मीद अछि जे कंजूसी मे हिनका सँ आगाँ सोचयवला लोक सम्भवतः नहिये भेटत। किंचित विश्वास नहि होयत। चलू हुनका जीवनक किछु उदाहरण सँ हम अपना बात केँ पुष्ट करवाक सफल कोशिश करैत छी।

धनेश्वर जी एक दूरस्थ सरकारी विद्यालय मे शिक्षक छथि। प्रत्येक शनिवार केँ गाम एनाय आ सोमवार केँ पुनः अप्पन विद्यालय गेनाय हुनक नियमित कार्यक्रम। गाम सँ रेलवे स्टेशनक दूरी १५ किलोमीटर। आजुक समय मे रिक्शा, टमटम, टेम्पो वा अन्य आवागमनक साधनक कुनु अभाव नहियो रहलाक बादो आयधरि धनेश्वर जी कोनो सवारी गाड़ी पर अपना देह केँ नहिये चढ़ा देलखिन्ह। सबदिन "बिनोबा ट्रान्सपोर्टक" (पैदल) सहायता सँ स्टेशन जाइत छथि आ भबिष्यो मे एहि अभ्यास केँ छोड़बाक कुनु योजना नहि छन्हि। दोसर उदाहरण लियऽ - सामान्य गाम घरक परिवार मे तीन प्रकारक तेलक उपयोग होइत अछि - करू (सरसों) तेल भोजनादि लेल, नारियल तेल - देह, माथ मे लागाबय लेल आ मटिया (किरासन) तेल - साँझ मे डिबिया लालटेन जराबय लेल। धनेश्वर जीक घर मे तीनू प्रकारक तेलक प्रवेश-निषेध अछि। घोर इमरजेन्सी मे एहि तेलक कम सँ कमतर प्रयोगक आग्रही सेहो छथि। ई अलग बात अछि जे लोकक ओहिठाम भोज-भात मे नीक सँ सबकिछु खाइत छथि दूध-दही, मिठाई आदि सब किछु परन्तु अपना घर मे एहि सब नीक निकूत खाद्य-पदार्थक अपना समक्ष प्रवेश वर्जित। कतेक उदाहरण दी - धनेश्वर जी गामक एक स्वाभाविक सुलभ सफाई-कर्मी सेहो छथि जे रास्ता, गली-कूची मे खसल सबटा घास-पात, गोबर वा आओर सबकिछु गामक लोकक द्वारा त्यक्त पदार्थ केँ नियमित रूप सँ एकटा बाल्टी मे समेट अपना खेत मे दऽ आबैत छथिन्ह। गामक लोक सफाई सँ निश्चिन्त। आब पाठकगण बुझि गेल हेबय हुनक कृपणताक महिमा। लागैया सन्तोष नहि भेल? लियऽ एकदम टटका वृतांत। धनेश्वर जीक समधि पानि लऽ केँ शौचालय तरफ विदा भेला तखने हुनका देखतहिं धनेश्वर उवाच - समधि लेट्रीन मे पानि कमे खसेबय कियैक टंकी जल्दी भरि जेतय। जय हो जय हो----

साँझक समय गामक चौपाल पर सब दिन जेकाँ गजानन बाबूक महफिल सजल छल। दिन शनिवार। धनेश्वर जी केँ आबैत देखि अचानक गजानन बाबू बाजि उठला - आबि गेला राजा कर्ण। ई सम्बोधन सुनितहिं हमरा सनक कम ज्ञानवला लोकक मुँह सँ हठात् निकलल - जा! अपने ई की कहि देलिये गजानन बाबू? एहेन कंजूस केर तुलना राजा कर्ण सनक दानी सँ कियैक? गजानन बाबू बजला - नहि बुझलिये? देखियो हमरा बुझने धनेश्वर जी तऽ राजा कर्णो सँ बेसी दानी छथि कियैक तऽ राजा कर्ण यदि किछु दान करैत रहथि तऽ किछु भोग सेहो करैत रहथि। लेकिन अपन  धनेश्वर सब किछु तऽ दाने कऽ रहल छथि। भोगय तऽ किछुओ नहि छथि। हुनके कमाय पर हुनक धिया-पुता, कनिया सब देखियो केहेन मजा सँ रहय छथिन्ह। धनेश्वर तऽ बस टाका कमाबयवला मशीन थीका। भोगय छथि आ भबिष्यो मे भोगता तऽ कियो आओर। कहू सर्वस्व दान कऽ देलखिन्ह की नहि? आब कहू कोनो शंका अछि जे धनेश्वर राजा कर्णो सँ पैघ दानी भेला कि नहि? हम अबाक भऽ गेलहुँ ऐहेन सार्थक आ सामयिक तर्कक सोझाँ ।

Wednesday, July 4, 2012

कनी टा सोचियो मन मे



यौ ककरा की, कखन कहबय, कनी टा सोचियो मन मे
जेबय कठियारी, आ हँसबय, कनी टा
सोचियो मन मे

कहब आभार भेल 
भारी, ग्रहण अछि मुँह पर लागल
कि हँसिकय दुख प्रगट करबय, कनी टा
सोचियो मन मे

स्वजन दुख मे अगर कानय, तखन की मोल सम्पति के
कि टाका सँग अहाँ जरबय, कनी टा
सोचियो मन मे

एखन सम्बन्ध परिवारक, जेहेन अखबार बसिका हो
एहेन दुनिया मे रहि सकबय, कनी टा
सोचियो मन मे

जीयब जौं संस्कारक सँग, तखन जिनगी सुमन-जीवन

ओना बढ़ियो केँ, नित खसबय, कनी टा
सोचियो मन मे

Saturday, May 26, 2012

बचल रहय परिवार

बात कहय मे नीक छल, बेटा गेल विदेश।
मुदा सत्य ई बात छी, असगर बहुत कलेश।।

विश्व-ग्राम केर व्यूह मे, टूटि रहल परिवार।
बिसरि गेल धीया-पुता, दादी केर दुलार।।

हेरा गेल अछि भावना, आपस के विश्वास।
भाव बसूला के बनल, भोगि रहल संत्रास।।

शिक्षित केलहुँ कष्ट मे, पूजि पूजि भगवान।
जखन जरूरत भेल तऽ, दूर भेल सन्तान।।

शिक्षित नहि करबय अगर, लोक कहत छी पाप।
मुदा एखन सन्तान लय, मातु-पिता अभिशाप।।

लागय अछि जिनगी एखन, बनल एक अनुबन्ध।
सभहक घर मे देखियौ, टूटि रहल सम्बन्ध।।

बेसी टाका की करब, करियौ सुमन विचार।
सुन्दर एहि सँ बात की, बचल रहय परिवार।।

Wednesday, May 23, 2012

रंग श्यामल रंग मे

गीत लिखलहुँ आयतक जे, भावना के सँग मे
ताहि कारण अछि सुमन के, रंग श्यामल रंग मे

जे एखन तक भोगि चुकलहुँ, गीत आ कविता लिखल
किछु समाजिक व्यंग्य दोहा, किछ गज़ल के ढंग मे

याद आबय खूब एखनहुँ, कष्ट नेनपन के सोझाँ
नौकरी तऽ नीक भेटल, पर फँसल छी जंग मे

छोट सन जिनगी कोनाकय, हो सफल नित सोचलहुँ
ज्ञान अर्जन सँग
जिनगीक, डेग सबटा उमंग मे

सोचिकय चललहुँ जेहेन, परिणाम तेहेन नहि भेटल
हार नहि मानब पुनः, कोशिश करब नवरंग
मे

Friday, May 18, 2012

हाथ पकड़लहुँ जखन सुमन के


मन सुरभित छल आस मिलन के, प्यास नयन मे तृषित नयन के
बाजल हिरदय धक धक धक धक, सुनितहिं धुन पायल छन छन के

दशा पूर्व के पहिल मिलन सँ, कहब कठिन ई सब जानय छी
साल एक, पल एक लगय छल, बढ़ल कुतुहल छन छन मन के

कोना बात शुरू करबय हम, कतेक बेर मन सोचि चुकल छल
भेटल छल हमरा नहि तखनहुँ, समाधान की, एहि उलझन के

बाहर हँसी ठहाका सभहक, सुनैत छलहुँ बस हम कोहबर सँ
चित चंचल मुदा सोचलहुँ बाँचल, चारि दिना एखनहुँ बन्धन के

धीर धरू अपने सँ कहिकय, कहुना अप्पन मोन बुझेलहुँ
वाक-हरण बस आँखि बजय छल, हाथ पकड़लहुँ जखन सुमन के





Thursday, May 10, 2012

कलाकन्द भऽ गेलहुँ (बाल-गीत)

धिया-पुता देखिकय आनन्द भऽ गेलहुँ
लड्डू नहि जिलेबी कलाकन्द भऽ गेलहुँ

केहेन सहज मुख पर मुस्कान छै
छन मे झगड़ा छनहि मिलान छै
तीरथ बेरागन  व्यर्थ करय छी 

सद्यः धिया-पुता सोझाँ भगवान छै
हँसी खुशी देखिकय बुलन्द भऽ गेलहुँ
लड्डू नहि जिलेबी कलाकन्द भऽ गेलहुँ

बनि कियो इन्जन रेल चलाबय
कियो फूँक मारय पीपही
बजाबय
बिनु पैसा के हँसि हँसि घूमय
छन कलकत्ता दिल्ली पहुँचाबय
लागय बच्चा सँगे जुगलबन्द भऽ गेलहुँ
लड्डू नहि जिलेबी कलाकन्द भऽ गेलहुँ

कियो जोर खसलय कियो जोर हँसलय
कियो ठेलि देलकय कहुना
सम्हरलय
देखलहुँ निश्छल रूप मनोहर
सुमन अपन सब कष्ट बिसरलय
मोन साफ भेल शकरकन्द भऽ गेलहुँ
लड्डू नहि जिलेबी कलाकन्द भऽ गेलहुँ

Tuesday, May 8, 2012

सुमन लिखत श्रृंगारक कविता

मीठगर बोली हम जनय छी
तैयो तीतगर बात करय छी

जौं साहित्य समाजक दर्पण
पाँती मे दर्पण देखबय छी

मिथिला के गुणगान बहुत भेल
जे आजुक हालात, लिखय
छी

भजन बहुत मिथिला मे लिखल
अछि पाथर, भगवान देखय छी

रोटी पहिने या सुन्दरता
सभहक सोझाँ प्रश्न रखय छी

भूख, अशिक्षा, बेकारी सँग
साल साल हम बाढ़ि भोगय छी

सुमन लिखत श्रृंगारक कविता
पहिने सूतल
केँ जगबय छी

Monday, May 7, 2012

कुक्कुर केँ सन्तान बनाबी

व्यर्थ कियै दालान बनाबी
घर केँ तोड़ि मकान बनाबी

टाका अछि तऽ आदर भेटत
द्वारो पर दोकान बनाबी

आगाँ पाछाँ लोक घूमत जौं
सज्जन केँ नादान बनाबी

बच्चा सब केँ हास्टल भेजू
कुक्कुर केँ सन्तान बनाबी

जीवन देलक आस लगाऽ जे
मातु पिता निम्झान बनाबी

सबटा सुख हमरे लग आबय
एहेन कियै अरमान बनाबी

हमहुँ जीबी लोकक संग मे
दुनिया सुमन महान बनाबी

Sunday, May 6, 2012

अपने घर मेहमान यौ

भेट जाय भगवान किंचित्, की भेटत इन्सान यौ 
मुँह सँ जे लोक अप्पन, मोन सँ बेईमान यौ

एक दोसर बात पर, विश्वास कोना, के करत
छोड़ि दियऽ बात आनक, प्रश्न मे सन्तान यौ

बल जाबत छल, कमेलहुँ, धन अरजलहुँ पुत्र लय
आय बनिकय छी उपेक्षित, अपने घर मेहमान यौ

काज आजुक जेहेन हम्मर, भाग्य निर्धारित तेहेन
सूत्र जीवन के बिसरिकय, कोन ठाँ अछि ध्यान यौ

नीति जेहेन, तेहने नीयत, वो नियति छी काल्हि के
जीबू अपनहुँ, लोक जीबय, ई सुमन अरमान यौ

Saturday, May 5, 2012

पुनि ताकू अछि राम हेरायल

कतय पुरनका  गाम हेरायल
किंचित् हमरो नाम हेरायल

प्रेम-सहज, सद्भाव, समर्पण
सचमुच ई परिणाम हेरायल

बुधियरका सब गेल 
शहर मे
हुनको छन्हि आराम हेरायल

शहर सँ टाका
, गामक खेती
सब छूटल,
अंजाम हेरायल

सुख-दुख मे जे छल सहयोगी
हृदय-भाव, सत्काम हेरायल

मान करय छल छोट, पैघ के
लागय एखन लगाम हेरायल

सुमन सहोदर भाग्य सँ
भेटल
पुनि ताकू अछि राम हेरायल

Friday, May 4, 2012

मैथिल मिथिला नाज हमर

भेद भाव बिनु सबकय जोड़ू, बाँचत तखन समाज हमर
सबकियो मिलिकय बाजू सगरे, चाही मिथिला राज हमर

राज बहुत पहिने सँ मिथिला, छिना गेल अछि साजिश मे
जाबत ओ सम्मान भेटत नहि, बाँचत कोना लाज हमर

विविध विषय के ज्ञानी मैथिल, दुनिया मे भेटत सगरे 
मुँह बन्द
राखब कहिया तक, के सुनतय आवाज हमर

आजादी के बादो सब दिन, भेल उपेक्षा सरकारी
बहल विकासक गंगा 
सगरे, बाँचल खाली काज हमर

सज्जनता श्रृंगार सुमन छी, दिल्ली बुझलक कमजोरी
जागू मिथिलावासी आबो, मैथिल मिथिला नाज हमर

Thursday, May 3, 2012

हँसी मुँह पर साटय छी


धीया-पुता दुख नहि बूझय, हँसी मुँह पर साटय छी
खरचा एक पुराबय खातिर, दोसर खरचा काटय छी

आजुक युग मे कम्प्यूटर बिनु, नवतुरिया सब की पढ़तय
मुदा माँग पर, टाका नहि तेँ, बच्चा सब केँ डाँटय छी

बनल बसूला सम्बन्धी-जन, बाजय मीठगर बोली यौ
दुख मे रहितहुँ पर विवेक सँ, सभहक हिस्सा बाँटय छी

अपन हृदय मे भाव जेहेन छल, बुझलहुँ छै तेहने दुनिया
चीन्हा गेल अछि अप्पन-अदना, हुनके सबकेँ छाँटय छी

सुमन संगिनी जीवन भेटल, रूप मनोहर काया संग
दुख भीजल तऽ चोकर आमक, रूप देखिकय फाटय छी

Wednesday, May 2, 2012

ई खटहा अंगूर छी

किछु कुबेर के चक्रव्यूह मे, कानूनन मजबूर छी
रही कृषक आ खेत छिनाओल, तहिये सँ मजदूर छी

छलय घर मे जमघट हरदम, हित नाता सम्बन्धी के

कतऽ अबय छथि आब एखन ओ, प्रायः सब सँ दूर छी

काज करय छी राति दिना हम, तैयो मोन उदास हमर

साहस दैत बुझाओल कनिया, अहाँ हमर सिन्दूर छी

एहेन व्यवस्था हो परिवर्तित, लोकक सँग आवाज दियौ

एखनहुँ आगि बचल अछि भीतर, झाँपल तोपल घूर छी

बलिदानी संकल्प सुमन के, कहुना दुनिया बाँचि सकय 

नहि बाजब नढ़िया केर भाषा, ई खटहा अंगूर छी

Monday, April 30, 2012

संस्कार सन्तान मे


स्वजन मृत्यु पर कानैत बाजैत, गेल छलहुँ शमशान मे
आनल जायब एहिना हमहुँ, आयल अचानक ध्यान मे

बाजी सब कियो राम नाम संग, सभहक गाति एहने होइछै
बाहर आबिते फूसि फटक्कर, केलहुँ शुरू दलान मे

बात सदरिखन की लऽ एलहुँ, की लऽ जायब दुनिया सँ
मुदा सहोदर सँ झगड़ा नित, होई छै नहि अन्जान मे

भाग्य लिखल जे हेबे करतय, काज करय के काज की
चिकरि चिकरि केँ बाजू एतबे, दास मलूक सम्मान मे

सुमन मनुक्खक जीवन भेटल, घटना छी अनमोल यौ
सफल तखन पल पल जीवन के, संस्कार सन्तान मे

Sunday, April 22, 2012

कियो हमर संगी बनू

चलू ताकय छी मिलि भगवान, कियो हमर संगी बनू।
कतऽ भेटला छी फुसिये हरान, कियो हमर संगी बनू।।

कियो कहय कण-कण मे, कियो कहय मन मे।
कियो कहय गंगा मे, कियो पवन मे।
नहि भेटल कुनु पहचान, कियो हमर संगी बनू।।

सुमरय छी दुख मे, बिसरय छी सुख मे।
पूजा के भाव कतय, नामे टा मुख मे।
छथि भक्तो बहुत अनजान, कियो हमर संगी बनू।।

करू लोक सेवा, तखन भेटत मेवा।
लोक-हित काज करू, लोके छी देवा।
सुमन कत्तेक बनब नादान, कियो हमर संगी बनू।।

Tuesday, April 17, 2012

रहबय कोहबर कत्तेक दिन

रहबय कोहबर कत्तेक दिन
बनिकय अजगर कत्तेक दिन

शादी तऽ एक संस्कार छी
जीबय असगर कत्तेक दिन

बिना काज के मान घटत नित
फूसिये दीदगर कत्तेक दिन

बैसल देहक काज कोन छै
एहने मोटगर कत्तेक दिन

आबहुँ जागू सुमन आलसी
खेबय नोनगर कत्तेक दिन

Monday, April 16, 2012

गलती बारम्बार करू

गलती बारम्बार करू
अधलाहा सँ प्यार करू

दुर्गुण सँ के दूर जगत मे
निज-दुर्गुण स्वीकार करू

दाम समय के सब सँ बेसी
सदिखन किछु व्यापार करू

अपने नीचा, मोन पालकी
एहि पर कने विचार करू

बल भेटत स्थायी, पढ़िकय
ज्ञानो पर अधिकार करू

भाग्य बनत कर्मे टा फल सँ
आलस केँ धिक्कार करू

प्रेमक बाहर किछु नहि भेटत
प्रीति सुमन-श्रृंगार करू

Saturday, April 14, 2012

चलू बैसिकय केँ कानय छी

रीति बिगड़ि गेल जानय छी
चलू बैसिकय केँ कानय छी

असगरुआ जौं
नहि नीक लागय
आओर लोक केँ आनय छी

समाधान आ कारण हमहीं
बात कियै नहि मानय छी

पैघ लोक के बात, सोचबय
के के एखन गुदानय छी

आस व्यर्थ छी बिना प्रयासक
फुसिये गप केँ तानय छी

नीक आओर अधलाह लोक केँ
कियै एक सँग सानय छी

लऽ कऽ चालनि सुमन हाथ मे
नीक लोक केँ छानय छी

Monday, April 9, 2012

मोन कियै सिंहासन पर

मोन कियै सिंहासन पर
घर मे आफत राशन पर

काज करय मे दाँती लागय
तामस झाड़ी बासन पर

लाज करू जे पाहुन जेकाँ
खाय छी कोना आसन पर

खोज-खबर नहि धिया-पुता के
बात सुनाबी शासन पर

बिना कमेने किछु नहि भेटत
जीयब खाली भाषण पर

कहू सोचिकय कहिया सुधरब
जखन उमरि निर्वासन पर

सुमन समय पर काज करू
आ सोचू निज अनुशासन पर

Thursday, March 29, 2012

तखने जीयब शान सँ

समय के सँग मे डेग बढ़ाबी, तखने जीयब शान सँ
किछु ऊपर सँ रोज कमाबी, तखने जीयब शान सँ

काका, काकी, पिसा, पिसी, रिश्ता भेल पुरान यौ
कहुना हुनका दूर भगाबी, तखने जीयब शान सँ

सठिया गेला बूढ़ लोक सब, 
हुनका बातक मोल की
हुनको नवका पाठ पढ़ाबी, तखने जीयब शान सँ

सासुर अप्पन, कनिया, बच्चा, एतबे टा पर ध्यान दियऽ
बाकी सब सँ पिण्ड छोड़ाबी, तखने जीयब शान सँ

मातु-पिता केर
 चश्मा टूटल, कपड़ा छय सेहो फाटल
कनिया लय नित सोन गढ़ाबी, तखने जीयब शान सँ

पिछड़ल लोक बसय
मिथिला मे, धिया-पुता सँ कहियो
अंगरेजी मे रीति सिखाबी, तखने जीयब शान सँ

सुमन दहेजक निन्दा करियो, बस बेटी
 वियाह मे
बेटा बेर मे खूब गनाबी, तखने जीयब शान सँ

Wednesday, March 28, 2012

कियै कानय छी

भेटेय छै फल अपन कर्मक जखन मानय छी
फुटल नसीब तखन कहिकय कियै कानय छी

खेलहुँ नय नीक-निकुत कहियो ककर दोष कहू
खाय छी कूटि केँ ओतबे नित लूटि आनय छी

रहल छी साल कतेक संगे आबो चीन्ह लियऽ
बुझिकय खाट कियै हमरा नित गतानय छी

लोक मे पानि भऽ रहल कम आओर दुनिया मे
आँखि के नोर सँ नित आटा हमहुँ सानय छी

लगल छी रोज प्रशंसा मे जिनका टाका छै
हुनक खराब छलय नीयत जखन जानय छी

बूढ़ केँ ज्ञान बिसरि कहलहुँ बोझ भऽ गेला
मोन सँ सोचि कहू हुनका के गुदानय छी

टूटल प्रतिज्ञा सुमन जखने तखन हूब घटल
करू प्रयास खूब मन सँ किछुओ ठानय छी

Tuesday, March 27, 2012

जतबय अछि औकात करय छी

कत्तेक सुन्दर बात करय छी
पाछाँ सँ आघात करय छी

जखनहि स्वार्थ सधल जिनका सँ
तखनहि हुनका कात करय छी

सगरे देख रहल छी प्रायः
झगड़ा हम बेबात करय छी

टाका सबटा गेल दहेजे
डीह बेचि बरियात करय छी

कनिको दुख नहि सुमन हृदय मे
जतबय
अछि औकात करय छी

Monday, March 26, 2012

खूब मोन सँ सभक सुनय छी

कनिये कनिये रोज लिखय छी
छात्र एखन, साहित्य सिखय छी

भारी भरकम बात लिखल नहि
घर-आँगन केर बात कहय छी

बेसी वक्ता, कम श्रोता
अछि
कविता सँ सम्वाद करय छी

कहियो नहि मन-दर्पण देखल
बाहर दर्पण रोज देखय छी

छी असगर ई भाव भीड़ मे
बनिकऽ पानी संग बहय छी

एहि जीवन मे दुख ककरा नहि
दुख मे नित मजबूत रहय छी

कियो सुमन के सत्य सुनल नहि
खूब मोन सँ सभक सुनय छी

Sunday, March 25, 2012

लागल एहेन रिवाज बिसरलहुँ

अप्पन अप्पन काज बिसरलहुँ
सच पूछू तऽ लाज बिसरलहुँ

सिखलहुँ लूरि जीबय के जतय
कियै ओहेन समाज बिसरलहुँ

छूटल अरिपन, सोहर सब किछु
लागल एहेन रिवाज बिसरलहुँ

सासुर मे छल खूब रईसी
घर मे नखरा-नाज बिसरलहुँ

मन गाबय छल गीत मिलन के
सुर के सँग मे साज बिसरलहुँ

संस्कार के बात करी नित
जीबय के अन्दाज बिसरलहुँ

चुप रहलहुँ अन्याय देखिकय
सुमन हृदय आवाज बिसरलहुँ

Saturday, March 24, 2012

ठेहुन छुबि प्रणाम देखय छी

दूर बहुत, पर गाम देखय छी
भेल बहुत बदनाम देखय छी

काली-पूजा, फगुआ, छूटल
दारू के परिणाम देखय छी

बापक कान्ह कोदारि सदरिखन
बेटा केर आराम देखय छी

कष्ट झुकय मे नवतुरिया केँ
ठेहुन छुबि प्रणाम देखय छी

अपनापन के बात निपत्ता
घर घर मे संग्राम देखय छी

धन के अर्जन घूसखोरी सँ
हुनके बड़का नाम देखय छी

सुमन सुधारक आशा टूटल
तखनहि केवल राम देखय छी

Thursday, March 15, 2012

व्यर्थक बात करय छी

अहाँ, व्यर्थक बात करय छी
सब दिन कहलहुँ, अहीं लऽ मरय छी।
अहाँ, व्यर्थक बात करय छी


आस लगेलहुँ, रूप सजेलहुँ, तखनहुँ
साजन अहाँ नहि एलहुँ।
काज करय में दिन कटैया, कुहरि कुहरिकय राति बितेलहुँ।
पेटक कारण, अहाँ बिनु साजन, जहिना तहिना रहय छी।
अहाँ, व्यर्थक बात करय छी।।

सब सखियन के साजन आयल, सभहक घर मे बाजय पायल।
हँसी मुँह पर ओढ़ि लेने छी, लेकिन भीतर सँ छी घायल।
विरहन के दुख, लोक बुझत की, तरे तर जरय छी।
अहाँ, व्यर्थक बात करय छी।।

पीड़ा मन के, बिनु बन्धन के, ककरा कहबय दुख जीवन के।
मजबूरी तऽ सब दिन रहतय, ताकू अवसर सुमन मिलन के।
आँखिक नोर सूखल पर भीतर नोरक संग बहय छी।
अहाँ, व्यर्थक बात करय छी।।

Sunday, February 19, 2012

फागुन मौसम के श्रृंगार

होली छी रंगक त्योहार
फागुन मौसम के श्रृंगार
सगरे फगुआक गीत संग ढोल बजैया
घर मे पिया बिनु कनिया किलोल करैया

पावनि बीतल भरि साल के, तखनहिं फगुआ आबय
कहियो बोल फुटल नहि जिनकर, सेहो गीत सुनाबय
साँचे, फगुनक दिन अनमोल लगैया
घर मे पिया बिनु कनिया किलोल करैया

पूआ आओर पकवान बनाकऽ, सबकेँ खूब खुवेलहुँ
एखनहुँ आँखि लगल देहरी पर, मुदा अहाँ नहिं एलहुँ
खाय छी किछुओ तऽ मुँह मे ओल लगैया
घर मे पिया बिनु कनिया किलोल करैया

बिनु जोड़ी के फागुन फीका, हरेक साल चलि आबू
लोक-वेद हमरो संग मे, फगुआ खूब खेलाबू
पिया, सुमन अहाँ केँ बकलोल कहैयाt
घर मे पिया बिनु कनिया किलोल करैया